गुरुवार, 26 मार्च 2026

सूर्य ग्रहण 12 अगस्त 2026

 सूर्य ग्रहण --

श्री संवत 2083 श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या बुधवार 12 अगस्त  20260को लगने वाला खग्रास सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा ।

यह ग्रहण पश्चिमी यूरोप पश्चिमी अफ्रीका उत्तरी अमेरिका ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक महासागर और उतरी प्रशांत महासागर में दिखाई देगा भारतीय मानक समय अनुसार ग्रहण का प्रारंभ रात्रि 09:04 मिनट पर तथा मोक्ष रात्रि में 01: 28 पर  होगा ।

चंद्र ग्रहण 20 अगस्त 2026

 चंद्र ग्रहण --

श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा शुक्रवार 28 अगस्त 2026 को लगने वाला खंड चन्द्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। यह ग्रहण अंटार्कटिका, अफ्रीका ,एशिया, यूरोप ,हिंद महासागर ,अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर में दिखाई देगा। 

1 - चंद्रास्त के समय ग्रहण का प्रारंभ यूक्रेन ,तुर्की ,सऊदी अरब ,यमन ,मेडागास्कर, रूस का पूर्वी भाग, हिंद महासागर और अफ्रीका के पूर्वी भाग में दिखाई देगा।

२ - चंद्रोदय के समय ग्रहण का अंत अलास्का ,न्यूजीलैंड और प्रशांत महासागर के कुछ भाग में दिखाई देगा।

भारतीय समय के अनुसार ग्रहण का प्रारंभ दिन में 8:04 am पर मोक्ष दिन 11:22 am पर होगा।

सूर्य ग्रहण 06 फरवरी 2027

 सूर्य ग्रहण -- 

माघ कृष्ण पक्ष अमावस्या शनिवार 6 फरवरी 2027 को लगने वाला कंकणा कृति सूर्यग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। यह ग्रहण दक्षिण अमेरिका, अंटार्कटिका पश्चिम और दक्षिण अफ्रीका ,अटलांटिक महासागर ,प्रशांत महासागर में दिखाई देगा।

भारतीय मानक समय अनुसार ग्रहण का प्रारंभ सायं 6:28 पर तथा मोक्ष रात्रि में 12:32 पर होगा।

श्री बद्रीनाथ मंदिर प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव 18 से 22 अप्रैल 2026 आप सपरिवार सादर आमंत्रित हैं। 🚩🚩जय श्री बद्री विशाल 🚩🚩

                                   ।। ।।
                         ।।श्री गणेशाय नमः।।

मंगलं भगवान विष्णु: मंगलं गरूड़ध्वज: ।

मंगलं पुण्डरी काक्ष: मंगलाय तनों हरि:।।


परिचय--

उत्तरांचल मित्र मंडल वसई जो हर रोज नई ऊर्जा नई जोश के साथ अपने कार्यो के द्वारा समाज मे नई ऊर्जा व दिशा देने का काम करती आ रही है । उत्तरांचल मित्र मंडल,वसई 2 अक्टूबर 1988 को स्थापित और 31 मई, 2001 को पंजीकरण हुई।

भूमि पूजन --

सोमवार 4 अप्रैल 2011 में हुआ ।

शिलान्यास -- 

रविवार 1 फरवरी 2015 को किया गया ।



श्री बद्रीनाथ मंदिर व श्री बद्रीश पंचायत प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव --

उत्तरांचल मित्र मंडल के द्वारा वसई पालघर में श्री बद्रीनाथ मंदिर निर्माण और मानव कल्याण केंद्र निर्माण का जो संकल्प लिया था,वह मूर्त रूप में दिखने लगा है । 

श्री बद्रीनाथ मंदिर में श्री बद्रीश पंचायत प्राण प्रतिष्ठा 18 अप्रैल से 22 अप्रैल 2026 में होने जा रही है । जो भक्तों के लिए सुनियोजित रूप 23 अप्रैल 2026 से खोला जाएगा । कुछ ही समय के अंतराल के बाद मानव कल्याण केंद्र, समाज कल्याण के लिए समर्पित किया जाएगा । मानव कल्याण केंद्र सभी चिकित्सा, शैक्षिक, खेल, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास , मानव जनसेवा गतिविधियों के लिए एक सामुदायिक केंद्र के रूप में काम करेगा।

उत्तरांचल मित्र मंडल वसई के  द्वारा विगत कई वर्षों से श्रीमद्भागवत कथा , सामुहिक यज्ञोपवीत संस्कार , शिवार्चन , रामायण , सुन्दर कांड ,भजन ,यज्ञ ,त्यौहार का आयोजन किया जाता है। धार्मिक, सांस्कृतिक आयोजन समय, समय पर होते रहते है। 

उत्तरांचल मित्र मंडल वसई नित्य समय समय पर मानव समाज कल्याण हेतु अपना योगदान देते रही है। जिससे समाज के गरीब असहाय लोगो को मदद मिलती रही है।

श्री बद्रीनाथ मंदिर प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में आप सभी पधार कर अपना तन मन धन से योगदान देकर यज्ञ के भागीदार बने । और पुण्य का लाभ लें, यह अवसर जीवन में बारंबार प्राप्त नहीं होते हैं । जीवन में जब अनेक जन्मों के पुण्यों का उदय होता है । तभी ऐसे धर्म कार्य में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त होता है । तो इसलिए आप सभी महानुभाव इस यज्ञ में सम्मिलित होकर  गौरवान्वित महसूस करें।

मंदिर निर्माण ,धर्मशाला के निर्माण ,गोचर भूमि दान , गरीबों में भोजन, अन्नदान ,यज्ञ में दान देना, ब्राह्मण को दान देना ,जीवों की रक्षा करना , यह मानव का प्रथम कर्तव्य है । कहते है धर्माथ करने से परमार्थ सही हो जाता है ।

भगवान श्री बद्री विशाल जी की कृपा आशीर्वाद पाने के लिए श्री बद्री विशाल मंदिर लोकार्पण में सपरिवार पधारकर इस ऐतिहासिक क्षण का लाभ लेकर आत्मसात् करें।

जय श्री बद्री विशाल 👏 👏 👏

बुधवार, 18 मार्च 2026

संवत २०८३ संवत्सर फल

                 ।। ॐ।।

     ।।श्री गणेशाय नमः।। 

       ।। संवत्सर फल ।।

श्री संवत् २०८३ वर्ष रौद्र नामक संवत्सर रहेगा । रौद्र नामक संवत्सर का वर्ष पर्यंत संकल्प में विनियोग करना चाहिए । इस वर्ष राजा गुरु व  मंत्री मंगल है । राजा वह मंत्री में परस्पर मैत्री भाव होने से शासक वर्ग प्रजा तथा पशु पक्षी आदि सुखी रहेंगे। व्यापारी वर्ग आदि के लिए शुभ फलदायक रहेगा । अधिकतर लोगों की मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा । यह रौद्र नामक संवत्सर अनेक समस्याओं को पैदा कर सकता है। अनेक देशों में विद्रोह होगा । जन धन की हानि होगी। विश्व व्यापार मैं परिवर्तन हो सकता है। महंगाई की स्थिति उभर सकती है। आतंकवाद वह उग्रवाद से विश्व में अनेक प्रकार की दुर्घटनाएं तथा विस्फोटक सामग्रियों से जनधन की हानि हो सकती है। अनेक देशों के सीमाओं पर सैन्य संघर्ष  से क्षति होगी। कहीं कहीं पर चक्रवात तूफान का तथा प्राकृतिक प्रकोप का सामना करना पड़ सकता है। 

राजा गुरु --


राजा गुरु होने से वर्षा अच्छी होगी बुद्धिमान लोग नित्य धर्म कार्य में रत रहेंगे और अनेक प्रकार के धार्मिक उत्सव देखने को मिलेंगे।


मंत्री मंगल --


मंगल के मंत्री होने से लोग बीमारियों से दुखी । किन्तु गयो में दूध अधिक होने से धर्म में तत्पर लोग सुखी रहेंगे ।


विषुवत संक्रांति फल--


जिन जातकों का जन्म नक्षत्र पूर्वाभाद्रपदा , उत्तराभाद्रपदा ,रेवती है । उन्हें विषुवत संक्रांति बाम पाद में है । 

अरिष्ट निवारण के लिए चांदी का पद दान करें ।  लाल कपड़ा ,सफेद कपड़ा, दही ,अन्न दान करें ।

चंद्रबल --

मेष सिंह धनु राशि वाले जातकों को विषुवत संक्रांति ( १ गते बैशाख) के दिन  कर्क , वृश्चिक, में राशि के जातकों को चंद्रमा प्रतिकूल ( अपैट ) हैं । शांति के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ करावे मोती चांदी चावल दही की श्वेत वस्त्र दक्षिणा आदि श्रद्धा पूर्वक दान करें । 

शनि की साढ़ेसाती और ढैया --


कुंभ मीन मेष राशि वालों को शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा ।

सिंह और धनु राशि वालों को शनि की ढैया रहेगी ।

मेष राशि वालों के सिर पर ,

मीन राशि वालों के हृदय पर, 

कुंभ राशि वालों के पैर पर, शनि का स्थान रहेगा ।

शनि के प्रभाव से बचने के लिए सुंदरकांड का पाठ हनुमान चालीसा का पाठ और शनिवार के दिन तेल, काला कपड़ा, उड़द , लोहा दान देने से शनि का प्रभाव खत्म होता है।

आचार्य हरीश चंद्र लखेड़ा 
      9004013983
             मुंबई 




रविवार, 18 जनवरी 2026

प्राण प्रतिष्ठा क्रम

मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का क्रम (संक्षेप में पूर्ण विधि)
मंदिर में देव-प्रतिमा की प्रतिष्ठा शास्त्रसम्मत विधि से होती है। सामान्यतः क्रम इस प्रकार होता है—
1️⃣ भूमि शुद्धि एवं वास्तु शांति
भूमि पूजन
वास्तु दोष निवारण
पंचगव्य से शुद्धि
2️⃣ अंकुरारोपण (बीज बोना)
शुभ मुहूर्त में जौ आदि का अंकुरण
यह यज्ञ की सिद्धि का संकेत माना जाता है
3️⃣ मंडप प्रवेश एवं देव आवाहन
यज्ञ मंडप की स्थापना
गणपति पूजन
नवग्रह पूजन
4️⃣ अग्नि स्थापना (हवन प्रारंभ)
वैदिक मंत्रों से अग्नि प्रज्वलन
मुख्य हवन प्रारंभ
5️⃣ जलाधिवास
प्रतिमा को पवित्र जल में स्थापित करना
नदियों, तीर्थों के जल का प्रयोग
6️⃣ धान्याधिवास
प्रतिमा को अन्न (धान, गेहूं आदि) में रखना
7️⃣ पुष्पाधिवास
प्रतिमा को पुष्पों के बीच रखना
8️⃣ शय्याधिवास
प्रतिमा को विश्राम हेतु शय्या पर रखना
9️⃣ नेत्रोन्मीलन (नेत्र खोलना)
स्वर्ण या चांदी की शलाका से नेत्र उद्घाटन
यही सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है
🔟 प्राण-प्रतिष्ठा
मंत्रों द्वारा देवता में प्राण तत्व की स्थापना
इसके बाद प्रतिमा सजीव देव स्वरूप मानी जाती है
1️⃣1️⃣ अभिषेक
पंचामृत, जल, गंगाजल से महाअभिषेक
1️⃣2️⃣ श्रृंगार एवं वस्त्र धारण
वस्त्र, आभूषण, चंदन, पुष्प अर्पण
1️⃣3️⃣ महाआरती एवं भोग
पूर्ण आहुति
देवता को भोग
महाआरती
1️⃣4️⃣ ब्राह्मण भोज एवं दक्षिणा
ब्राह्मणों को भोजन
दान-दक्षिणा

सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

दीपावली पूजन मुहूर्त 20अक्टूबर 2025

दीपावली पूजन का शुभ मूहर्त 20 अक्टूबर 2025


दीपों का त्योहार ,खुशियां मिले हजार ।

दीप सजाओ, लक्ष्मी कृपा बरसे अपार ।।


दीपावली का त्योहार भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। दीपावली का यह पर्व प्रत्येक वर्ष कार्तिक कृष्ण अमावस्या तिथि पर मनाया जाता है।

प्रदोष काल ,निशा व्यापनी अमावस्या तिथि, स्थिर लग्न पर दीपावली लक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य की वृद्धि ,व्यापार मे नित्य उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। मां लक्ष्मी का आशीर्वाद सदा बना रहता है ।

दीपावली तिथि --

20 अक्टूबर 2025 को दीपावली का शुभ पर्व मनाया जाएगा। 

20 अक्टूबर 2025 सोमवार को 2:56 पर अमावस्या लगेगी। दूसरे दिन 21 अक्टूबर 2025 मंगलवार को 4:26 तक अमावस्या रहेगी।

दीपावली मुहूर्त --

वृषभ लग्न -- सायं 7:10 से रात्रि 9:06 तक है जो दीपावली के लिए उत्तम समय माना जाता है। 

सिंह लग्न --अर्धरात्रि 1:38 से 3:52 तक सिंह लग्न रहेगा।

कुंभ लग्न -- कुंभ लग्न दिन में 2: 56 से दिन में 4:05 के मध्य तक रहेगा।

ब्रह्मा जी का एक दिन

 

*ब्रह्मा जी के एक दिन की गणना*


पूर्ण भगवान् कृष्ण व्रजेन्द्रकुमार।

गोलोके व्रजेर सह नित्य विहार।। 

ब्रह्मार एकदिने तिँहो एकबार। 

अवतीर्ण हञा करेन प्रकट विहार।।

अनुवाद - व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही पूर्ण भगवान् हैं। व्रजधाम समन्वित गोलोकमें वे नित्य - विहार करते हैं। ब्रह्माके एक दिनमें वे एक बार इस जगत्‌में अवतीर्ण होकर प्रकट-लीला करते हैं।

ब्रह्मा जी का एक दिन

सत्य त्रेता द्वापर कलि चरियुग जानि।

सेइ चरियुगे दिव्य युग मानि।।

एकात्तर चतुर्युगे एक मन्वन्तर।

चौद्द मन्वन्तर ब्रह्मार दिवस भितर।।

अनुवाद - सत्य, त्रेता, द्वापर और कलिं, ये चार युग होते हैं। ये चारों युग मिलकर एक दिव्य-युग कहलाते हैं। इकहत्तर चतुर्युगोंका एक मन्वन्तर होता है और ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं।

ब्रह्मा जी के एक दिन को एक कल्प कहते हैं। 


एक दिन में 14 मन्वंतर


एक मन्वंतर में 71 चतुर्युग


एक चतुर्युगी में चार युग 


1. सत्य

2. त्रेता 

3.द्वापर 

4.कलि


यह चारों एक युग या युगी कहलाता है।


एक युगी की गणना


कलि  = 4,32000

द्वापर = 8,64000

त्रेता = 12, 96000

सत्य = 17,28000


Total एक चतुर युगी के साल हुए।


43,20,000 


इसको एक युग बोला जाता है 

एक युगी - 


43,20,000 × 71 

=30,67,20,000 साल होते हैं ।


यह एक मन्वन्तर का परिणाम है इसे गुणा करते हैं 14 से।


30,67,20,000×14  

=4,29,40,80,000 

यह ब्रह्मा जी का एक दिन का परिणाम है 4,29,40,80,000,


एक दिन में 14 मन्वतर होते हैं - फिर एक महीने में देखते हैं फिर एक साल में देखते हैं,  फिर 100  साल में 

1  दिन में 14 

14 × 30 दिन में = 420 

420 × 12 महीने में  

= 5040 


5040×100 साल


एक साल में 5040 

100 साल की ब्रह्मा की आयु है यानि 5040 × 100  = 5,04,000  मनु होते हैं।


ब्रह्मा जी के एक दिन में 

कलि  = 994 बार आता है ।

द्वापर  = 994 बार आता है ।

त्रेता = 994 बार आता है ।

सत्य = 994 बार आता है।


अब यहां पर एक संधिकाल आता है जो 15 सत्य युगों के परिणाम का होता है ।

15 × 17,28,000  =  2,59,20,000  


6  महायुगों के काल से देखें तब भी यही आएगा  ( एक चतुर्युगी के साल )

6 × 43,20,000  =  2,59,20,000


इस प्रकार 14  मन्वन्तरों और संधिकाल को मिलाकर एक हज़ार महायुगों के काल के बराबर ब्रह्मा का एक दिन एक कल्प होता है और इतनी ही बड़ी ब्रह्मा जी की रात्रि भी होती है 


'वैवस्वत' नाम एइ सप्तम मन्वन्तर 

साताइश चतुर्युग गेले ताहार अन्तर 

अनुवाद - वर्तमान सप्तम मन्वन्तरका नाम वैवस्वतं' है और इसके सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके हैं।


अनुभाष्य - वैवस्वत - नामके सातवें मनुके मन्वन्तरमें श्रीमन्महाप्रभुका आविर्भाव होता है “स्वायम्भुवाख्यो मनुराद्य आसीत्, स्वारोचिषश्चोत्तम-तामसाख्यौ। जातौ ततो रैवतचाक्षुषौ च वैवस्वतः सम्प्रति सप्तमोऽयम्॥ सावर्णिर्दक्षसावर्णिब्रह्मसावर्णिकस्ततः । धर्मसावर्णिको रुद्रपुत्रो रौच्यश्च भौत्यकः ॥” 


14  मनु के नाम इस प्रकार हैं 


(१) स्वायम्भुव, 

(२) स्वारोचिष, 

(३) उत्तम, 

(४) तामस, 

(५) रैवत, 

(६) चाक्षुष, 

(७) वैवस्वत, 

(८) सावर्णि, 

(९) दक्षसावर्णि, 

(१०) ब्रह्मसावर्णि, 

(११) धर्मसावर्णि, 

(१२) रुद्रपुत्र (सावर्णि), 

(१३) रोच्य (देवसावर्णि) और 

(१४) भौत्यक (इन्द्रसावर्णि)

– ये चौदह मनु हैं। प्रत्येक मनु का भोगकाल इकहत्तर महायुग है।

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

विजया दशमी

विजया दशमी

(आश्विन शुक्ल दशमी)

आश्विन मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को विजया दशमी और लौक व्यवहार की भाषा में दशहरा कहते हैं । भगवान ने इसी दिन लंका पर चढ़ाई करके विजय प्राप्त की थी । 

'ज्योति र्निबन्ध में लिखा है- आश्विन शुक्ला दशमी को तारा उदय होने के समय ' विजय ' नामक काल होता है । वह सब कार्यों को सिद्ध करने वाला होता है । विजया दशमी हमारा राष्ट्रीय पर्व है । दशमी के दिन रामचन्द्रजी की सवारी बड़ी धुमधाम के साथ निकलती है। और रावण - वध की लीला का प्रदर्शन होता है । इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है । 


होली , दीपावली और रक्षाबंधन के समान ही हमारे चार प्रमुख त्यौहार में से एक है विजया दशमी ,पूरे भारतवर्ष में उत्तर से दक्षिण तक सभी वर्ण और वर्ग के व्यक्ति पूरी धूमधाम से मनाते हैं यह त्यौहार । 

क्षत्रियों का विशेष दिन--

प्राचीनकाल से ही इसे क्षत्रियों , राजाओं और वीरों का विशेष त्यौहार माना जाता रहा है । आज के दिन अस्त्र - शस्त्रों , घोड़ों और वाहनों की विशेष पूजा की जाती है । प्राचीन काल में तो राजा - महाराजा आज विशेष सवारियां और सैनिक परेड निकालते थे तथा ब्राह्मणों को प्रचुर दान देते थे । 

वैसे दशमी को रामलीला का समापन और रावण , उसके पुत्र मेघनाद और भाई कुम्भ कर्ण के पुतलों का दहन ही आज का विशिष्ट उत्सव रह गया है । बंगाली भाई आज नौ दिन के दुर्गा और काली पूजन के बाद मूर्तियों का नदियों में विसर्जन भी बड़ी धूमधाम से करते हैं तथा बड़े - बड़े जलूस निकालते हैं ।

इनके अतिरिक्त प्रत्येक क्षेत्र और परिवार में दशहरा मनाने के अलग - अलग कुछ विधान भी हैं । कुछ क्षेत्रों में गोबर का दशहरा रखकर उसकी पूजा भी की जाती है । इसी प्रकार अनेक परिवारों में आज बहिनें भाइयों के तिलक भी करती हैं । प्रथम नौ रात्रे के दिन देवी के नाम के जौ बोकर आज के दिन उनके छोटे - छोटे पौधे उखाड़ कर  भाइयों को देने का रिवाज भी कुछ क्षेत्रों में है।

आज के दिन जगह जगह रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड  पाठ,का आयोजन किया जाता है,और राम लक्ष्मण सीता जी और हनुमानजी की विशेष पूजन, झाकियां निकाली जाती है। 

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शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

आचार्य पंडित जी मिलेंगे

सनातन संस्कृति संस्काराे में आस्था रखने वाले सभी धर्म प्रेमी धर्मानुरागी परिवारों का स्वागत अभिनंदन ।

आपको बताते हर्ष हो रहा है। कि हमारे पंडित जी मिलेंगे ब्लॉग के माध्यम से सभी प्रकार के षोडश संस्कार, शतचंडी ,सहस्र चंडी,लक्ष्य चंडी , रुद्राभिषेक, लघुरुद्र ,महारुद्र ,अतिरुद्र , कथा , भजन संध्या , माता की चौकी , रामायण , सुंदरकांड , नवग्रह शांति , कालसर्प दोष शांति , श्री महामृत्युंजय जप , गृहप्रवेश वास्तु शांति , कुंडली निर्माण , कुंडली मिलान ,वार्षिक व्रत आदि कर्म , मूर्ति मंदिर प्राण प्रतिष्ठा , आदि सभी कर्म करवाए जाते है । 

सभी प्रकार के कर्मकांड हेतु ब्राह्मण उपलब्ध करवाए जाते है । 

आप सभी वॉट्सएप के इस लिंक के माध्यम से जुड़ सकते है ।

मैसेज करे--




मंगलवार, 16 सितंबर 2025

नित्य प्रायः सायं स्मरणीय मंगल श्लोक

प्रातः व सायंकाल नित्य मंगल श्लोक का पाठ करने से बहुत कल्याण होता है। दिन अच्छा बीतता है। दुःस्वप्न भय नही होता है। धर्म मे वृद्धि ,अज्ञानता का नाश , निर्धन से धनी होना । सभी प्रकार की बाधाओं से छुटकारा मिलता है।

इससे व्यक्ति में दैवीय गुणों का आधान होता है। प्रातः काल मे मंगलकारी मंगलाचरण के साथ दैनिक दिनचर्या को प्रारम्भ करना चाहिये।

                   ।।  प्रथम गणपति वन्दना ।।      


ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरुमेदेव सर्व कार्येषु सर्वदा ।।

         गजाननं   भूत   गणादि सेवितं  ।

         कपित्थ जम्बू फल चारु भक्षणं।।

         उमा सुतं शोक  विनाश कारकं ।

         नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।


               ।।  गुरु वन्दना ।।                   

गुरु  ब्रह्मा  गुरु विष्णु: गुरु देवो महेश्वर:।

गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।


मुकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।

यत्कृपा तमहं वन्दे   परमानंद माधवम  ।।


अज्ञानंतिमिरांधस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन  तस्मै  श्रीगुरवे नमः ।।


         ।।  व्यास जी ध्यान  ।।               


व्यसाय विष्णु रूपाय ,व्यास रूपाय विष्णवे ।

नमो वै ब्रह्मनिधये  , वाशिष्ठाय नमो नमः ।।


नमोस्तुते व्यास विशाल बुद्धे 

फुल्लार रविन्दाय तपत्र नेत्रं ।

येन त्वया भारत तैल पूर्णे: 

प्रज्वालितो ज्ञान मयः प्रदीप ।।


नारायणं  नमस्कृत्य   नरं चैव नरोत्तम्म ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जय मुदीरयेत ।।


सीता राम समारम्भाम श्रीरामानंदार्य मध्यमाम् ।

अस्मदाचार्य पर्यंतां   वन्दे श्रीगुरु  परम्पराम् ।



           ।।श्री विष्णु वन्दना ।।               


शान्ताकारं   भुजगशयनं   पद्म नाभं    सुरेशं ।

विश्वाधारं   गगन   सदृशं मेघ वर्णम शुभांगम।।

लक्ष्मीकान्तम कमलनयनं योगीभिर्ध्यान गम्यम ।

वन्दे  विष्णुम  भवभयहरं सर्व   लोकैकनाथम् ।।


           ।। कृष्ण वन्दना ।।                     


वसुदेव   सुतं     देवं      कंस    चाणूरमर्दनं।

देवकी परमानन्दम कृष्णम वन्दे जगदगुरूम।।

श्री कृष्ण गोबिन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।  

हे नाथ नारायण वासुदेव    हे नाथ नारायण वासुदेव ।।

                   ।।श्री राम वन्दना ।।                  


रामाय  राम भद्राय  राम चंद्राय वेधसे ।

रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।।


राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।

सहस्रनाम ततुल्यं राम नाम वरानने ।।


                    ।।  हनुमान वंदना ।।।              


मानोजपं मारुत तुल्य वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम ।

वातात्मजं  वानरयूथमुख्यं  श्रीराम  दूतं  शरणं  प्रपद्ये ।।


                    ।।श्री गौरी शंकर वन्दना ।।       


कर्पूर   गौरं  करुणावतारं  संसारसारं  भुजगेन्द्रहारं ।

सदा वसन्तम हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितंनमामि।।


               ।। श्री दुर्गा देवी वन्दना ।।              


सर्व  मंगल मांगल्ये  शिवे  सर्वार्थ साधिके ।

शरण्ये   त्र्यम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते।।


जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी ।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।


                  ।।श्री महालक्ष्मी वन्दना ।।          


महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।

हरि प्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ।।


नमोस्तुते महामाये श्री पीठे सुर पूजिते ।

शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते ।।

              ।।श्री सरस्वती वन्दना ।।                


सरस्वती  महाभागे  विध्ये  कमल  लोचने।

विद्या रूपी विशालाक्षी विद्याम देहि नमोस्तुते।।


सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः ।

वेद वेदान्त वेदाङ्ग बिद्या स्थनीभ्यः एवं च ।।


या कुन्देन्दुतुषारहारधवला   या शुभ्रवस्त्रा  वृता ।

या वीणा वर दंड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना ।।

या ब्रह्मा च्युत शंकर प्रभृतिभिर्देवै: सदा वंदिता ।

सा मा पातु सरस्वती भगवती निः शेष जाड्या पहा ।।


शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमा माद्यम जगदव्यापिनी 

वीणापुस्तकधारिणीमभयदां    जाड्यान्धकारापहाम्। 

हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधती पद्मासने संस्थितां

वन्दे  तां  परमेश्वरि  भगवती   बुद्धि  प्रदां शारदाम्  ।।


                  ।।  सूर्य वन्दना  ।।                     


आदित्यं च नमस्कार ये कुर्वन्ति दिने दिने।

जन्मांतर  सहस्रेषु  दारिद्रम  नोप जयते ।।

नमो धर्म विधात्रे हि नमो कर्म  सुसाक्षिणे।

 नमो प्रत्यक्ष देवाय भास्कराय नमोनमः।।


              ।। नवग्रह स्मरण ।।               


        ब्रह्मा मुरारि स्त्रिपुरान्त कारी ।

        भानुः शशी भूमि सुतो बुधश्च।।

        गुरुश्च शुक्र: शनिराहु केतवः।

        सर्वेग्रहा  शान्तिकरा भवन्तु।।



            ।। मंत्र पुष्पांजलि ।।         

यज्ञेन यज्ञ मयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्या सन् 

तेहनाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।। 

ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने।नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे । समे कामान काम कामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु । कुबेराय  वैश्रवणाय  महाराजाय नमः।।

ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठयं राज्यं महाराज्य माधिपत्य मयं समन्त पर्यायी स्यात् सार्वभौमः सार्वायुष आन्तादापरार्धात् । पृथिव्यै समुंद्र पर्यन्ताया एक राडिति। तदप्येष श्लोकोऽभि गीतो मरुतः परिवेष्टारो मरूत स्यावसन् गृहे।आविक्षितस्य काम प्रेर्विश्वे देवाः सभासद् इति ।।  


 सेवन्तिका वकुल चम्पक पाटलाब्जैः।

 पुन्नाग जाति  करवीर रसाल  पुष्पैः।।

 बिल्व प्रवाल  तुलसीदल मंजरीभिः।

 त्वां पूजयामि जगदीश्वर मे प्रसीद ।।


नाना सुगंधि पुष्पाणि यथाकालोद् भवानि च । 

पुष्पांजलिर्मया   दत्त    गृहाण    परमेश्वर ।।


कायेन  वाचा     मनसेन्द्रियैर्वा ।

बुद्धयात्मना वानुसृत स्वभावात् ।। 

करोमि  यद्यत्  सकलं परस्मै ।

नारायणायेति    समर्पयेतत् ।। 


सर्वे  भवन्तु  सुखिनः  सर्वे सन्तु  निरामयाः । 

सर्वे भद्राणि पश्यन्ति मा कश्चिद दुःख भाग्भवेत् ।। 


त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।

त्वमेव सर्वं मम देव  देवः ।। 

                           ।।प्रदक्षिणा।।                  


यानी कानी च पापानि जन्मांतर कृतानि च ।

तानी सर्वाणि पश्यन्तु प्रदक्षिणाम पदे पदे ।।


                         ।। क्षमा प्रार्थना ।।              


अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया । 

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि।।१ ।।

आवाहनंन जानामि , न जानामि विसर्जनम् । 

पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥२ ॥ 

मन्त्रहीन क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । 

यत्यूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।।३ ।।

अपराध शतंकृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् । 

यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयाः सुराः ।।४ ।। 

सापराधोऽस्मिशरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके । 

इदानी मनु कम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ।।५ ।। 

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्यूनमधिकं कृतम् । 

तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि।।६ ।। 

कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।

गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि।।७ ।। 

गुह्याति गुह्यगोप्ती त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । 

सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि।।८ ।। 



 ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

     पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। 

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                             पं हरीश चंद्र लखेड़ा
                                 ज्योतिषाचार्य
                                      वसई
                                जय बद्री विशाल
                              


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